(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

15.1. अध्यायः


मौसलपर्व - अध्याय 006
॥ श्रीः ॥
15.6. अध्यायः 006
Mahabharata - Mausala Parva - Chapter Topics
दारुकेण हास्तिनपुरमेत्य पाण्डवेषु सर्वयादवक्षयनिवेदनम्॥ 1 ॥ अर्जुनेन द्वारकामेत्य रुक्मिण्यादिपरिसान्त्वनपूर्वकं वसुदेवगृहंप्रति गमनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Mausala Parva - Chapter Text

वैशम्पाय उवाच।

दारुकोपि कुरून्गत्वा दृष्ट्वा पार्थान्महारथान्।
आचष्ट मौसले वृष्णीनन्योन्येनोपसंहृतान्॥ 15-6-1(97053)
श्रुत्वा विनष्टान्वार्ष्णेयान्सभोजान्धककौकुरान्।
पाण्डवाः शोकसंतप्ता वित्रस्तमनसोऽभवन्॥ 15-6-2(97054)
ततोऽर्जुनस्तानामन्त्र्य केशवस्य प्रियः सखा।
प्रययौ मातुलं द्रष्टुं नेदमस्तीति चाब्रवीत्॥ 15-6-3(97055)
स वृष्णिनिलयं गत्वा दारुकेण सह प्रभो।
ददर्श द्वारकां वीरो मृतनाथामिव स्त्रियम्॥ 15-6-4(97056)
याः स्म ता लोकनाथेन नाथवत्यः पुराऽभवन्।
तास्त्वनाथास्तदा नाथं पार्थं दृष्ट्वा विचुक्रुशुः॥ 15-6-5(97057)
षोडश स्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहाः।
तासामासीन्महान्नादो दृष्ट्वैवार्जुनमागतम्॥ 15-6-6(97058)
तास्तु दृष्ट्वैव कौरव्यो बाष्पेणापिहितेक्षणः।
हीनाः कृष्णेन पुत्रैश्च नाशकत्सोभिवीक्षितुम्॥ 15-6-7(97059)
स तां वृष्ण्यन्धकजलां हयमीनां रथोडुपाम्।
वादित्ररथघोषौघां वेश्मतीर्थमहाग्रहाम्॥ 15-6-8(97060)
रत्नशैवलसंघातां वज्रप्राकारमालिनीम्।
रथ्यास्रोतोजलावर्तां चत्वरस्तिमितह्रदाम्॥ 15-6-9(97061)
रामकृष्णमहाग्राहां द्वारकां सरितं तदा।
कालपाशग्रहां भीमां नदीं वैतरणीमिव॥ 15-6-10(97062)
ददर्श वासविर्धीमान्विहीनां वृष्णिपुङ्गवैः।
गतश्रियं विरानन्दां पद्मिनीं शिशिरे यथा। 15-6-11(97063)
तां दृष्ट्वा द्वारकां पार्थस्ताश्च कृष्णस्य योषितः।
सस्वनं बाष्पमुत्सृज्य निपात महीतले॥ 15-6-12(97064)
सात्राजिती ततः सत्या रुक्मिणी च विशांपते।
अभिपत्य प्ररुरुदुः परिवार्य धनंजयम्॥ 15-6-13(97065)
ततस्तं काञ्चने पीठे समुत्ताप्योपवेश्य च।
अभिनन्द्य महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे॥ 15-6-14(97066)
ततः संस्तूय गोविन्दं कथयित्वा च पाण्डवः।
आश्वास्य ताः स्त्रियश्चापि मातुलं द्रष्टुमभ्यगात्॥ ॥ 15-6-15(97067)

इति श्रीमन्महाभारते मौसलपर्वणि षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥

Mahabharata - Mausala Parva - Chapter Footnotes
7-6-14 अब्रुवन्त्यो महामानमिति झ.पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.